सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को उस वक्त हाई वोल्टेज ड्रामा देखने को मिला जब एक मामले की पैरवी खुद कर रहे याचिकाकर्ता ने पहले जजों को ‘न्यायिक सेवक’ कहकर संबोधित किया और फिर सुप्रीम कोर्ट के जजों को आदेश देने की कोशिश की और इसके बाद कथित तौर पर भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल शुरू कर दिया।
इसके बाद जब कोर्टरूम स्टॉफ ने उसे पकड़ने की कोशिश की तो याचिकाकर्ता ने कोर्टरूम में कागज भी हवा में उछाल दिए। हालात बिगड़ते देख सुरक्षाकर्मियों ने उसे कोर्टरूम से बाहर निकाल दिया। हालांकि, पूरे घटनाक्रम के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने उसके खिलाफ अवमानना या दूसरी दंडात्मक कार्रवाई शुरू नहीं करने का फैसला किया।
सुप्रीम कोर्ट में हंगामा करने वाले याचिकाकर्ता की पहचान प्रबल प्रताप के रूप में बताई गई है। वह पेशे से वकील बताया जा रहा है और अपने मामले में स्वयं याचिकाकर्ता के रूप में अदालत के सामने पेश हुआ था।
अदालत के कामकाज में व्यवधान और न्यायाधीशों के खिलाफ कथित अपशब्दों के इस्तेमाल के बावजूद पीठ ने याचिकाकर्ता के खिलाफ अवमानना या दूसरी दंडात्मक कार्यवाही शुरू नहीं करने का फैसला किया। जस्टिस केवी विश्वनाथन ने स्पष्ट किया कि अदालत उसके खिलाफ कोई कार्रवाई करने का प्रस्ताव नहीं करती। अदालत ने याचिकाकर्ता के मामले से जुड़े दस्तावेजों का अध्ययन करने के बाद उसकी विशेष अनुमति याचिका भी खारिज कर दी।
जस्टिस विश्वनाथन ने कहा कि याचिकाकर्ता बहुत परेशान था और उसका व्यवहार उसकी हताशा का नतीजा था। अदालत ने कहा कि उसे याचिकाकर्ता के प्रति केवल सहानुभूति है। यही वजह रही कि कोर्ट ने कथित दुर्व्यवहार के बावजूद उसके खिलाफ अवमानना या अन्य दंडात्मक कार्रवाई शुरू नहीं की।
प्रबल प्रताप ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। यह विवाद लखनऊ के विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के एक आदेश से जुड़ा था। याचिकाकर्ता चाहता था कि उसके आरोपों के आधार पर पुलिस को एफआआर दर्ज करने का निर्देश दिया जाए। हालांकि, मजिस्ट्रेट ने सीधे एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने के बजाय उसके आवेदन को निजी शिकायत के रूप में मानकर आगे की प्रक्रिया अपनाने का निर्देश दिया था।
मजिस्ट्रेट के आदेश के खिलाफ प्रबल प्रताप ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख किया था। हाईकोर्ट ने उसकी याचिका खारिज करते हुए कहा था कि निचली अदालत के आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता के पास प्रभावी वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध है। इसके बाद वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी।
(जनचौक ब्यूरो)